कांतारा: चैप्टर 1′ एक अलौकिक, रहस्यमयी और विजुअल रूप से दमदार फिल्म है, जिसमें दर्शकों को कण-प्रतिभा, लोक-गाथा और अद्भुत सिनेमा का मिलाजुला अनुभव मिलता है। ऋषभ शेट्टी ने निर्देशन और अभिनय, दोनो में जबरदस्त कौशल का प्रदर्शन किया है। फिल्म का संगीत, बैकग्राउंड स्कोर और विजुअल इफेक्ट्स थिएटर में देखने लायक हैं, खास कर एक्शन और क्लाइमेक्स के दौरान। हालांकि, कुछ दर्शकों को फिल्म की कहानी थोड़ी कमजोर और भ्रमित करने वाली लग सकती है, लेकिन इसकी प्रस्तुति, संस्कृति और लोकगाथा की गहराई से यह कमियां छुप जाती हैं.
कहानी और प्रस्तुति
फिल्म की शुरुआत कदंब वंश के एक लालची शासक की कथा से होती है, जो कांतारा की दिव्य भूमि और उसके रक्षक दैवों पर कब्जा करना चाहता है। इस पृष्ठभूमि में बांगड़ा राज्य, उसके निर्दयी शासकों और कांतारा के युवा बेरेमी (ऋषभ शेट्टी) के संघर्ष की कहानी आगे बढ़ती है। लोककथाओं, धार्मिक विश्वास और जंगल की अलौकिक शक्तियों के साथ मानवीय दरारों का ताना-बाना बहुत सुंदरता से बुना गया है.
अभिनय और तकनीकी पक्ष
ऋषभ शेट्टी, रुक्मिणी वसंत और गुलशन देवैया की एक्टिंग सराहनीय है। ऋषभ शेट्टी की परफॉर्मेंस को कई दर्शकों ने ऑस्कर लेवल बताया है और एंडिंग के अंतिम दस मिनट रौंगटे खड़े कर देते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक, फोक आर्ट्स की प्रस्तुति और शॉट्स का चुनाव ओटीटी या मोबाइल स्क्रीन के बजाय थिएटर में अनुभव करने योग्य है.
कमजोरियां
बीच में फिल्म की कहानी कहीं-कहीं कमजोर पड़ती है और कुछ दर्शकों को प्लॉट कन्फ्यूजिंग या राइटिंग कमजोर लग सकती है। फिर भी, सेकंड हाफ में यह फिल्म अपने शिखर पर पहुंचती है और क्लाइमैक्स दर्शकों को संतुष्ट करता है.
देखना चाहिए या नहीं?
‘कांतारा: चैप्टर 1’ भारतीय माइथोलॉजी, लोकगाथा और विजुअल सिनेमाई अनुभव पसंद करने वालों के लिए, थिएटर में देखना एक अलग ही अनुभव है। इसकी विजुअल्स, एक्शन और लोक कथाओं का मिश्रण फिल्म को खास बनाता है.
उपसंहार में, यह फिल्म अपने संस्कृति, साउंड डिजाइन और क्लाइमेक्स की वजह से देखी जानी चाहिए, भले ही इसकी कहानी हर किसी को पूरी तरह संतुष्ट ना कर पाए.